Sunday, 23 October 2016

चलो ढूँढें !!





मंदिर मस्जिद करते करते, कितनों की यहाँ जान गयी,
इसी उधेड़ बुन में डूबी, कितनों की पहचान गयी !!
कोई कहता हुआ हलाल, या समय ये बलिदान का है,
खबर नहीं उनको भी ये,  अंतर सिर्फ ज़बान का है !!
रूह उनकी निकलती है और आत्मा निकले हमारी,
अल्लाह की या है भगवान् की ये ज़िम्मेदारी?
उनकी अम्मी बिलखती है और आंसू बहाए हमारी मां,
इस रिश्ते में भी मज़हब ढूँढ लो तो कौन है अपना यहाँ!!
सम्मान जो है हमारा, आबरू भी उनकी है,
छोटी सी राधा है हमारी, मरियम प्यारी उनकी है !!
ढूँढने चले अल्लाह को मस्जिद में एक दिन जो हम,
मंदिरों में भी ढूँढा राम के किस्से-कलम!!
तुम समझते हो बैठे हैं, इमारतों में भागवान भी,
दुनिया की खबर जो रखे, फुर्सत कहाँ उसे आराम की!!
है उस पानी में अल्लाह जो किसीने पिला दिया,
राम बैठे हैं उसमे, जो दिया तुमने जला दिया !!
ताकते तुम्हे वो हर सुबह की अज़ान में,
आज सवेरे तुमको रास्ता दिखाया राम ने !!
रोटी का टुकड़ा बिन सोचे तुमने जो था खा लिया,
जा खेतों में हमने फिर, उस गेंहूं का पता लिया!!
अल्लाह को देखा हमने बीज को बोते हुए,
और देखे  राम पीछे पानी फिर देते हुए !!
आँखों पर फिर ज़ोर दे कर देखा फिर से एक बार,
अल्लाह पानी देते थे अब, राम बोते लगातार !!
इन दोनों के लिए ही तो, हम लड़ मरते हैं दुनिया में,
देखो ये साथ हैं चलते, एक छोटी सी बगिया में !!
अब जाने कब आएगा होश, ये तो दोनों साथ में हैं,
लड़ मरें या साथ रहे अब, सब हमारे हाथ में है !!

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