Saturday, 23 February 2019

दो सौ साल बाद - Short Story

दो सौ साल बाद

ये बात किसी को पता न थी, पर गुल्लू अपने गाँव के पुराने बरगद से बातें करता था| ये बात किसी को न बताना, यह भी उसे बरगद ने ही कहा था| गुल्लू जब हर दिन स्कूल से लौटकर आता था तब माँ उसे ज़बरदस्ती खाना खिलाकर सुला देती थी वरना वो तो भागा-भागा उसी समय अपने बरगद के पास पहुँच जाता |
गुल्लू को याद भी न था कि उसने पहली बार बरगद से कब बात की थी|  जब वो छोटा था तब उसने माँ को एक दो बार बताया था कि बरगद ने ऐसा कहा, पर माँ ने यकीन नहीं किया| क्यों यकीन नहीं किया? ये उसे नहीं पता था| फिर अगले ही दिन बरगद ने उससे कहा कि यह बात वो किसीको न बताये| वो लोग जो बरगद से बातें कर सकते हैं वो अलग हैं, ख़ास हैं| गुल्लू को अच्छा लगा| हर शाम की तरह खेलने के बाद पांच बजे वो बरगद के पास पहुंचा|
बरगद: “आज बड़ी देर कर दी गुल्लू मियाँ?”
गुल्लू: “माँ ने फिर डांट कर सुला दिया था| और एक बार मैं सो गया तो सो गया| फिर मुझे कुम्भकरण भी नहीं उठा सकते|”
“फिर आज कैसे उठे?”
“अरे, वो ओंकार आ गया था, खेलने के लिए बुलाने| आज आइस-पाइस नहीं खेला, आज तो बस गिरगिट ढूँढ ढूँढ कर उसकी पूँछ पर पत्थर मार रहे थे| हा..हा..बड़ा मज़ा आया| ये गिरगिट इधर भाग रहा था, कभी उधर|”
“आपको कितनी बार कहा है कि ऐसे निर्दोष प्राणियों को नहीं परेशान करते, वो आपसे कुछ बोल भी नहीं पाते|”
“तुमने कब कहा?”
“अच्छा तो मैंने नहीं कहा था कि गिट्टी पिल्ले को परेशान मत करना ?”
“वो तो तुमने उसके लिए कहा था| फिर कहाँ किया परेशान? उसको तो मैं रोज दूध दे आता हूँ|”
“कुत्ते के लिए कहा तो गिरगिट के लिए भी वही है| कुत्ता नहीं बोल सकता, गिरगिट भी, पेड़ भी|
“ये तुम खुद अपने मुँह से कह रहे हो| भूल गए कि तुम भी एक पेड़ हो?”, गुल्लू ने आश्चर्य से उसे कहा|
“अरे, तो सब पेड़ मेरे जैसे बात नहीं कर सकते, बोलना तो मैंने तब शुरू किया जब मैं दो सौ साल का हो गया”
“तुम्हें बोलना सीखने में दो सौ साल लगे?, गुल्लू को इस बात पर भरोसा नहीं हुआ|
“सीखने में तो नहीं, पर पेड़ों को बात करने में दो सौ साल लगते हैं”, बरगद ने समझाया|
“इसीलिए और कोई पेड़ मुझसे बात नहीं करते?”
“हाँ| मैं चाहता हूँ जाने के पहले मैं ये भाषा किसी को सिखा जाऊं जो मैंने अपने भाई से सीखी थी| मेरे बगल में ही था वो | हम दोनों खूब बातें करते थे| अगर मैंने ये किसी को नहीं सिखाया तो आगे कोई ये भाषा सीख नहीं पायेगा|” बरगद ने दुखी मन से कहा|
“क्यों?”
“तुम देख तो रहे हो, गुल्लू| हर जगह आये दिन छोटे छोटे उम्र के पेड़ कट रहे हैं| वो पीछे वाले शीशम के बगीचे में भी सब चले गए| मैं इंतज़ार करता रह गया कि वो बड़े होंगे| मैं उनसे बातें करूँगा| इंसानों के लिए हम सबकुछ करते हैं, पर उनको मोह नहीं| पढ़ने में भी हमसे बने पेन्सिल, किताबें इस्तमाल करते हैं| फिर उसी पढ़ाई का इस्तमाल कर हमसे घर, कुर्सी, मेजें बनाते है| उन्हें नहीं समझ आता कि साथ मिलकर आगे बढ़ने में ही हम सबका भला है|”
“तुम चिंता न करो, बरगद| मैं कल ही तुम्हारे बगल में पेड़ लगा दूँगा, रोज पानी दूँगा, धीरे धीरे वो बड़ा हो जायेगा फिर तुमसे बात करेगा और मैं भी उससे बात करूँगा|”
गुल्लू के भोलेपन पर बरगद को हँसी आ गयी| वो उसको यह कहकर दुखी नहीं कर सकता था कि इंसान दो सौ वर्ष तक जीवित नहीं रहते|
“हाँ बिलकुल” बरगद ने उसकी हाँ में हाँ मिलाने में भलाई समझी| वो खुश था कि चलो एक इंसान में तो इतनी अक्ल है कि वह पर्यावरण के लिए कुछ अच्छा करना चाहता है|
गुल्लू घर चला गया और सुबह जब माँ ने आम खाने को दिया तो उसने गुठली को चुपके बस्ते में रख लिया| आम और बरगद अच्छे दोस्त बनेंगे उसने सोचा|
शाम को वो दौड़ता हुआ गुठली लेकर बरगद के पास पहुंचा| बरगद वहाँ नहीं था| बरगद की ठूंठ मुँह बाए खड़ी थी|  आवाज़ लगाने पर भी आवाज़ न आई| गुल्लू बहुत रोया| ये इंसानी दरिंदों ने उसके बरगद को भी मार दिया| गुस्से से तमतमाया गुल्लू समझ नहीं पा रहा था कि वो क्या करे| ठूंठ के बगल में उसने गुठली दबा दी|
प्रण लिया कि रोज वो इसे पानी देगा और इससे बात करेगा, दो सौ साल बाद |

Sunday, 23 October 2016

चलो ढूँढें !!





मंदिर मस्जिद करते करते, कितनों की यहाँ जान गयी,
इसी उधेड़ बुन में डूबी, कितनों की पहचान गयी !!
कोई कहता हुआ हलाल, या समय ये बलिदान का है,
खबर नहीं उनको भी ये,  अंतर सिर्फ ज़बान का है !!
रूह उनकी निकलती है और आत्मा निकले हमारी,
अल्लाह की या है भगवान् की ये ज़िम्मेदारी?
उनकी अम्मी बिलखती है और आंसू बहाए हमारी मां,
इस रिश्ते में भी मज़हब ढूँढ लो तो कौन है अपना यहाँ!!
सम्मान जो है हमारा, आबरू भी उनकी है,
छोटी सी राधा है हमारी, मरियम प्यारी उनकी है !!
ढूँढने चले अल्लाह को मस्जिद में एक दिन जो हम,
मंदिरों में भी ढूँढा राम के किस्से-कलम!!
तुम समझते हो बैठे हैं, इमारतों में भागवान भी,
दुनिया की खबर जो रखे, फुर्सत कहाँ उसे आराम की!!
है उस पानी में अल्लाह जो किसीने पिला दिया,
राम बैठे हैं उसमे, जो दिया तुमने जला दिया !!
ताकते तुम्हे वो हर सुबह की अज़ान में,
आज सवेरे तुमको रास्ता दिखाया राम ने !!
रोटी का टुकड़ा बिन सोचे तुमने जो था खा लिया,
जा खेतों में हमने फिर, उस गेंहूं का पता लिया!!
अल्लाह को देखा हमने बीज को बोते हुए,
और देखे  राम पीछे पानी फिर देते हुए !!
आँखों पर फिर ज़ोर दे कर देखा फिर से एक बार,
अल्लाह पानी देते थे अब, राम बोते लगातार !!
इन दोनों के लिए ही तो, हम लड़ मरते हैं दुनिया में,
देखो ये साथ हैं चलते, एक छोटी सी बगिया में !!
अब जाने कब आएगा होश, ये तो दोनों साथ में हैं,
लड़ मरें या साथ रहे अब, सब हमारे हाथ में है !!

Thursday, 20 October 2016

थूक दिया और सोचा नहीं !


थूक दिया और सोचा नहीं,
हम गरम खून हैं, परवाह नहीं,
इस हाथ ने झाड़ू देखी नहीं,
धरती ही तो है, माता नहीं |

इस सोच के साथ जो बड़े हुए,
कुछ लोग अभी तक अड़े हुए,
गन्दा होना तो है ही इसको,
धरती ही तो है, माता नहीं|

अपने घर को खालिस रखेंगे,
और बाहर कूड़ा फेकेंगे,
धरती तो सब निगल ही लेगी,
फ़ेंक दो चलो, ये क्या बोलेगी?

एक दिन सब उगलेगी धरती,
अब तक थी जो सहा सब करती,
तेरा कूड़ा तेरे ऊपर,मुंह फेर कर आएगा,
उस गन्दगी के बोझ तले, तू अवाक रह जायेगा|

अभी समय है सुधरने का,
अब न बिगाड़ करने का,
सीने में जिसके शूल गए,
उसे याद करो जिसे भूल गए|

उठा झाड़ू इसे करो साफ़,
शायद कर दे वो गलती माफ,
बच्चो को माफ करना आता ही है |
ये धरती जो है, माता ही है |



-    प्रीति सिंह की कलम से |
(स्वच्छता दिवस के उपलक्ष पर )

Thursday, 29 September 2016

उरी का प्रतिशोध ||


एक गूँज उठी उस रात में,
हाहाकार मची चारों ओर,
जब अश्वथामा आया चुपके से,
ले हाथ तलवार बिना शोर||

न वो कोई था बलवान,
कायर वो रात में आया था,
उसके सीने में बल नहीं,
बस अन्धकार का साया था||

प्राण लूँगा मैं उन पांडवों के,
प्रण उसके पापी मन में था|
एक यही लक्ष्य दुर्योधन के बाद,
उसके संपूर्ण जीवन में था||

फिर जब उसने हर लिए प्राण,
माधव न रह सके मौन|
ले चक्र उठा उसे दिया श्राप,
इस वचन से उसे बचाता कौन?

जा तू जीएगा सालों साल,
पर मरने को तू तरसेगा|
कोढ़ी बन इस धरती पर तू,
जीवन पर्यन्त भटकेगा||

ये श्राप था द्वापर युग में,
कुछ ऐसा ही हुआ कलयुग में फिर|
जब रात के अँधेरे में डूबी थी उरी,
आये कुछ नर-भक्षक भारत में फिर||

सोये थे कुछ सिपाही देश के,
देश की रक्षा कर दिन भर|
उस नींद को भी लुटा दिया,
जाए कैसे नींद भी निष्फल||

कुछ लोग याचना करते हैं अब,
आगे मित्रता का हाथ बढ़ाओ|
बैरी होने से कुछ न मिलेगा,
प्राणी हो प्राणी को अपनाओ||

जब माधव ने ना किया क्षमा,
हम किस खेत की मूली हैं?
सीने में दागेंगे गोली,
वो रात हमें क्या भूली है?

प्रतिशोध तो लेना ही था,
अब तुले का भार भिन्न नहीं,
शांत हो जाओ तुम भी अब,
हमारा मन भी अब खिन्न नहीं||

पर मानवता के नाम पर हमसे,
यह अहिंसा का ढोंग न होगा||
जब वार तुम एक बार करोगे,
हमारा उत्तर भी कम न होगा ||

अहिंसा के राह पर चलो,
कुछ लोग हमें सिखलाएंगे |
पर जब भी देश पर वार करोगे,
हम महाभारत ही दोहराएंगे||



Wednesday, 3 August 2016

The Palace of Illusions !!

The Palace of Illusions By Chitra Banerjee Devakurni

https://www.goodreads.com/book/show/1774836.The_Palace_of_Illusions"

A woman born in a man's world??
Isn't this the case with every woman in this world??
Damn right it is...In this world, which has defined every aspect with physical power and made man the most powerful..a woman strives to make her space.
Draupadi is no exception..she strives to make history...she is bold, confident , mesmerizing, subtle, argumentative , witty, loving and full of vengeance. Chitra portrays her as a very well defined non-mystical character who has our very own human feelings. Go for it.

P.S.- Just go with the flow. You might not agree with some things. But that is what Mahabharata is about. Every one has his own perception.

 Read all my reviews on:

https://www.goodreads.com/review/list/35361274-preeti-singh"